सियासत, इंसानियत और सलाखें — एक आवाज़ की कहानी Azam Khan
इस लेख की कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे सियासत में पहचान मिली, लेकिन इंसानियत उसकी असली पहचान रही। Azam Khan वरिष्ठ सपा नेता का सफर सिर्फ राजनीति का नहीं बल्कि संघर्ष, इल्ज़ाम और हौसले का सफर है। एक परिवार, एक आवाज़ और एक विचार को खामोश करने की कोशिशों के बीच खड़ी एक सच्चाई की कहानी।
ये अंत नहीं है ——————-🥹
Azam Khan case: आखिर कब खत्म होगा ये विवाद?

एक इंसान…
जो मोहब्बत करता है, शादी करता है और एक सुकून भरी ज़िंदगी जीता है।
घर में अपनापन, बाहर इज़्ज़त — और सियासत में ऊँचा मुकाम।
लेकिन उसकी असली पहचान कुर्सी नहीं, ईमानदारी होती है।
वो रिश्तों में भी सच्चा और अपने फ़र्ज़ में भी सच्चा।
वो तख़्त से नहीं, दिलों से हुकूमत करना चाहता है।
जब सियासत से ऊपर इंसानियत होती है
जब समाज में नफ़रत बढ़ती है, वो मोहब्बत की बात करता है।
जब लोग दीवारें बनाते हैं, वो पुल बनाने की कोशिश करता है।
गरीब बच्चों के लिए स्कूल बनाना,
इल्म के लिए यूनिवर्सिटी बसाना,
और मज़लूमों की आवाज़ उठाना
यही उसका असली मक़सद बन जाता है।
लेकिन अक्सर सच्चाई सबसे बड़ा जुर्म बना दी जाती है।
संसद की आवाज़ और सज़ा की शुरुआत
संसद में खड़े होकर जब वरिष्ठ सपा नेता आज़म ख़ान साहब मुसलमानों पर हो रहे ज़ुल्म की बात करते हैं,
तो ताली नहीं, साज़िशें शुरू होती हैं।
और उसी दिन से उनके ख़िलाफ़ इल्ज़ाम, मुक़दमे और बदनामी का सिलसिला चल पड़ता है।
उनकी ओर उनके परिवार की गिरफ्तारियों का सिल सिला शुरू हो जाता है
यह कहानी जुड़ी है
Azam Khan
से जिनकी आवाज़ को ख़ामोश करने की कोशिश की गई।
उनसे उनकी हमसफ़र
Tazeen Fatima
को जुदा किया गया,
और बेटे
Abdullah Azam Khan
के साथ बाप-बेटे को सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
जब घर से अदालत तक का सफर बन जाए ज़िंदगी
उम्र के उस पड़ाव में
जहाँ इंसान सुकून चाहता है,
वहाँ उन्हें तारीख़ों और मुक़दमों के बीच जीना पड़ता है।
घर उजड़ सकता है,
लेकिन हौसला नहीं।
Azam Khan कहानी का अंत नहीं — इतिहास का इंतज़ार
सलाखें जिस्म को क़ैद कर सकती हैं,
लेकिन विचार को नहीं।
साज़िशें नाम मिटा सकती हैं,
मगर ख़िदमत नहीं।
इतिहास हमेशा देर से लिखता है
लेकिन जब लिखता है,
तो अदालत नहीं…
कौम के दिल फैसला सुनाते हैं। ये एक राजनीतिक विवाद बदले की भावना से ज़्यादा कुछ नहीं
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