डॉ तज़ीन फातिम जी Azam Khan Abdullah Azam Khan इस परिवार की कहानी सिर्फ़ कामयाबी, तालियों और चुनावी जीत की नहीं, बल्कि कोर्ट‑कचहरियों, केसों और जेल की सलाखों के सायों से भी भरी हैडॉ तज़ीन फातिम जी Azam Khan Abdullah Azam Khan इस परिवार की कहानी सिर्फ़ कामयाबी, तालियों और चुनावी जीत की नहीं, बल्कि कोर्ट‑कचहरियों, केसों और जेल की सलाखों के सायों से भी भरी है

“Azam Khan Family Story: चुनावी जीत से लेकर कोर्ट-कचहरी और जेल तक का पूरा सच”

Azam Khan परिवार की कहानी सिर्फ़ राजनीतिक सफलता और चुनावी जीत तक सीमित नहीं रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में Azam Khan Family और उनके परिवार का नाम जितना ताक़तवर रहा, उतना ही यह परिवार कानूनी विवादों, कोर्ट-कचहरी के मामलों और जेल से जुड़े केसों के कारण भी सुर्खियों में रहा है।

डॉ तज़ीन फातिम जी Azam Khan Abdullah Azam Khan इस परिवार की कहानी सिर्फ़ कामयाबी, तालियों और चुनावी जीत की नहीं, बल्कि कोर्ट‑कचहरियों, केसों और जेल की सलाखों के सायों से भी भरी है
Dr Tazeen Fatima , Azam Khan Sahab , Abdullah Azam Khan

जो तस्वीर में दिख रही है वो प्रोफेसर रह चुकी हैं  वे एक शिक्षिका से राजनीति में आई हुई वह बहादुर महिला हैं जिन्हें लोग एक प्रोफेसर, एक जनप्रतिनिधि और आज़म ख़ान साहब की हमसफ़र के रूप में जानते हैं। डॉ तज़ीन फातिम जी उन्होंने ज़िंदगी किताबों, क्लासरूम और विद्यार्थियों के बीच गुज़ारी, लेकिन जब महसूस किया कि संसद और विधानसभा की कुर्सियों पर बैठने वाले लोग ही समाज की दिशा तय करते हैं, तो उन्होंने तय किया कि अब अपने शोहर के साथ सीधे सियासत के मैदान में उतरकर देश और समाज की सेवा करनी है, खासकर उन दबे‑कुचले लोगों की, जिन्हें न्याय की चौखट तक पहुँचना भी एक सपने जैसा लगता है। एक प्रोफेसर का संवेदनशील दिल और तज़ुर्बेकार दिमाग मिलकर जब राजनीति में आता है, तो उसके एजेंडे में नफ़रत नहीं, बल्कि तालीम, इंसाफ़ और बराबरी सबसे ऊपर होते हैं

उनके साथ‑साथ चलने वाले बेटे अब्दुल्लाह आज़म ख़ान उस नई पीढ़ी की आवाज़ हैं, जिसने मशीनों और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन दिल में यह तय किया कि असल इंजीनियरिंग तो समाज की टूटती दीवारों को जोड़ने की है।उन्होंने अपनी डिग्री को सिर्फ़ नौकरी का ज़रिया नहीं, बल्कि एक सोच बनाया कि टेक्नॉलॉजी की भाषा समझने वाला नौजवान अगर राजनीति में आएगा, तो वह अपने वालिद और वालिदा की तरह नफ़रत और झूठ नहीं, बल्कि डेटा, तर्क और विज़न के साथ काम करेगा, ताकि हिंदू‑मुस्लिम, हर मज़हब, हर जाति के लोग यह महसूस कर सकें कि यह बेटा सिर्फ़ अपने घर का नहीं, पूरी क़ौम और पूरे मुल्क का है। उनका सपना है कि एक अच्छे भारत में एक अच्छे मुसलमान के तौर पर जीते हुए यह साबित करें कि वफ़ादारी का पैमाना मज़हब नहीं, इंसाफ़ और इंसानियत है, और यही सबक उन्हें अपने वालिद के लंबे सियासी सफ़र से मिला है।

लेकिन इस परिवार की कहानी सिर्फ़ कामयाबी

तालियों और चुनावी जीत की नहीं, बल्कि कोर्ट‑कचहरियों, केसों और जेल की सलाखों के सायों से भी भरी है, जहाँ एक बुज़ुर्ग बाप का दिल अपने घर से दूर जेल की कोठरी में हर रात यह सोचते हुए धड़कता है कि क्या यही इनाम है उन वर्षों का, जो उन्होंने अपने शहर, अपने प्रदेश और अपने देश की सियासत को दिए।आज़म ख़ान साहब जैसे नेता पर सैकड़ों मुक़दमे दर्ज किए गए, कई मामलों में सज़ा सुनाई गई, जिनमें ज़मीन, सर्टिफिकेट और जबरन क़ब्ज़े से जुड़े आरोप भी शामिल हैं वे और उनका बेटा अब्दुल्लाह आज़म खान कई केसों में सज़ा काट रहे हैं, जबकि उनकी पत्नी को कुछ मामलों में ज़मानत मिल चुकी है, फिर भी परिवार की रूह आज भी जेल की दीवारों से टकराती आहें सुनता है। अदालतें अपने सबूत और क़ानून के हिसाब से फ़ैसला करती हैं, पर एक बुज़ुर्ग पिता की आँख से देखें तो हर तारीख़, हर फैसला, हर सज़ा उसके बूढ़े शरीर पर एक नया बोझ बनकर गिरती है, और वह अंदर‑ही‑अंदर यह सवाल करता है कि क्या राजनीतिक मतभेदों की कीमत इंसानी ज़िंदगी और इज़्ज़त से वसूली जानी चाहिए

Azam Khan Sahab Abdullah Azam Khan
Azam Khan Sahab Abdullah Azam Khan

दूसरी तरफ़, एक बुज़ुर्ग माँ का दर्द कहीं ज़्यादा खामोश

लेकिन उतना ही गहरा है यह वही औरत है जिसने बरसों तक विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में बच्चों को किताबों के ज़रिये इंसाफ़ और लोकतंत्र का मतलब समझाया, और आज खुद यह महसूस करती है कि जमानत के काग़ज़ के पीछे भी कितनी लंबी जद्दोजहद और बेबसी छुपी है। वह सोचती है कि जिसने पूरी उम्र कानून, संविधान और अधिकारों की पढ़ाई पढ़ाई, उस पर अचानक इतने मामले कैसे दर्ज हो गये, कैसे एक प्रोफेसर से रातों‑रात ‘अपराधी’ का तमगा जोड़ दिया गया जेल के महीनों ने उनके शरीर को कमज़ोर किया, लेकिन उनके यक़ीन को और मजबूत कर दिया कि सच चाहे जितना देर से पहुंचे, उसका सफ़र ज़रूर पूरा होता है। एक माँ होने के नाते उनके लिए सबसे बड़ा ज़ख्म यह है कि एक तरफ़ बूढ़ा पति सलाखों के पीछे है, दूसरी तरफ़ जवान बेटा भी उसी रास्ते पर चलने की सज़ा भुगत रहा है, और घर की दहलीज़ पर रोज़ उनकी खामोश दुआएँ बेटों की सलामती और इंसाफ़ की उम्मीद के साथ लौट आती हैं।

अब्दुल्लाह आज़म ख़ान के लिए यह जेल की दीवारें सिर्फ़ सज़ा नहीं

बल्कि एक इम्तिहान हैं कि क्या वह तंग गलियारों में भी अपने दिल की उदार सोच को ज़िंदा रख पाएँगे, जो उन्हें हिंदू‑मुस्लिम, गरीब‑अमीर, हर तबके के लिए एक जैसा खड़ा होना सिखाती है। इंजीनियरिंग पढ़ने वाला यह नौजवान जानता है कि अदालतें अपने फ़ेसले देंगी, राजनैतिक हकीकतें बदलती रहेंगी, लेकिन अगर उसने हार मान ली तो उन युवाओं की उम्मीद भी टूट जाएगी जो उसे अपने जैसा पढ़ा‑लिखा, सपने देखने वाला और सिस्टम के भीतर रहकर बदलाव की कोशिश करने वाला चेहरा मानते हैं। इस परिवार की कहानी में वैचारिक बहस की गुंजाइश हमेशा रहेगी कोई उन्हें गुनहगार कहेगा, कोई सियासी साज़िश का शिकार; मगर एक बूढ़े बाप के काँपते हाथों, एक थकी हुई माँ की नम आँखों और जेल की सलाखों के पीछे खड़े जवान बेटे की खामोश मुस्कान में जो दर्द और हौसला है, वह इस बात का गवाह है कि वे अपनी सोच से पीछे हटने को तैयार नहीं, चाहे कीमत आज़ादी हो या सियासी भविष्य |

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