azam khanazam khan

Azam Khan साहब ओर Abdullah Azam Khan का जेल में वक्त

Azam Khan साहब ओर Abdullah Azam Khan का जेल में वक्त आज़म खान साहब अब्दुल्लाह, जेल इंसानों को टूटने नहीं समझदार बनने भेजती है। आज़म खान साहब हल्की मुस्कान के साथ बेटा, हर दौर का अंत हुआ है। राजे-महाराजे गए, ज़ालिम हाकिम गए बस सब्र और इल्म ही साथ रहते हैं।

जेल की दीवारें ऊँची हों, बंद दरवाज़े हों, पहरेदार हों फिर भी इंसान की फितरत में सोचने की आज़ादी होती है।

Azam Khan Our Abdullah Azam Khan Inside Jail
Azam Khan Our Abdullah Azam Khan Inside Jail

सुबह की शुरुआत

फजर से पहले ही आँख खुल जाती होगी।
ठंडी हवा और अज़ान की आवाज़ कानों तक पहुँचती होगी दिल से अल्लाहू अकबर की पुकार ज़रूर उठती होगी।
दोनों पिता पुत्र वज़ू करते होंगे, पतली दरी पर खड़े होकर नमाज़ अदा करते होंगे।

दुआ में शायद यही कहते हों

या अल्लाह, सब्र दे, और मुल्क में इंसाफ़ कायम कर।
आपसी भाईचारे को खत्म न होने देना हिन्दू मुस्लिम सभी धर्मों में प्यार भरोसा कायम कर ।

दिन के उजाले के साथ

नाश्ता सादा — चाय और दो रोटियाँ।
आज़म साहब शायद किताबें पढ़ते होंगे इतिहास, कानून, और उर्दू अदब।
अब्दुल्लाह साहब शायद डायरी लिखते होंगे
आज जो देखा, जो महसूस किया, जो सीखा।

कुछ देर बाद दोनों टहलने निकलते होंगे।

चुपचाप चलते-चलते अचानक बात शुरू होती होगी:
अब्दुल्लाह साहब
अब्बा, क्या ये सब कभी बदल पाएगा? क्या न्याय मिलेगा?

आज़म खान साहब हल्की मुस्कान के साथ
बेटा, हर दौर का अंत हुआ है। राजे-महाराजे गए, ज़ालिम हाकिम गए बस सब्र और इल्म ही साथ रहते हैं।

दोपहर का वक़्त

ज़ोहर की नमाज़ के बाद बैठकर मुल्क और कौम के हालातों पर बात होती होगी।
कभी मुस्कुराकर पुरानी बातें याद करते होंगे चुनाव, विधानसभा, भाषण…और कभी खामोशी छा जाती होगी, जैसे लफ़्ज़ भी थक गए हों।

शाम और रात

अस्र, मग़रिब, फिर ईशा…
हर नमाज़ के साथ दिल में उम्मीद की एक नयी लौ।

रात को खाना साधारण — दाल, सब्ज़ी, और चावल।
फिर दोनों चुपचाप आसमान न देख पाने की कमी महसूस करते होंगे, क्योंकि जेल में आसमान भी टुकड़ों में नज़र आता है।

आख़िरी बातें Azam Khan साहब ओर Abdullah Azam Khan

सोने से पहले शायद आख़िरी बात होती होगी आज़म खान साहब
अब्दुल्लाह, जेल इंसानों को टूटने नहीं समझदार बनने भेजती है।

अब्दुल्लाह साहब
अब्बा, बाहर लोग इंतज़ार कर रहे हैं?

आज़म खान साहब
हाँ बेटे, इंतज़ार भी है… और इम्तहान भी।

और यूँ दिन बीत जाता है
नमाज़ों, बातों, खामोशियों, यादों और उम्मीद के सहारे।
बाहर दुनिया चल रही है राजनीति, नफ़रत, चुनाव, चर्चे
और अंदर दो लोग अपनी किस्मत नहीं, बल्कि अपने सब्र और इमान को मज़बूत कर रहे हैं।

Azam Khan sahab or Modi ji POST

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