Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।

Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।

Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।
Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।

आज़म खान साहब के बड़े भाई शरीफ खान साहब की पत्नी जी का इंतकाल हो गया,

लेकिन जेल की चहारदीवारी में कैद
आज़म खान साहब और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म खान साहब को अंतिम विदाई देने की इजाज़त तक न मिली।
यह खबर न सिर्फ परिवार का दर्द बढ़ा रही है, बल्कि न्याय की उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है जो इंसानियत को कानून के नाम पर कुचल देती है।

निधन रामपुर में हुआ, जहां परिवार ने जिला मजिस्ट्रेट से चार घंटे की पैरोल की गुजारिश की लेकिन अफसरों ने ठुकरा दिया, मानो जेल की सलाखें मौत के दुख को भी रोक लेंगी। आज़म खान खान जो दो पैन कार्ड मामले में सात साल की सज़ा काट रहे हैं, और अब्दुल्लाह आज़म खान साहब दोनों बेबस खड़े हैं, कानून के सामने इंसान कहां? भाभी का जनाज़ा भाई के आंसू ये सब जेल की दीवारों से परे नहीं जा पाते।

 

समाजवादी पार्टी के इस दिग्गज नेता को राजनीतिक साज़िशो का शिकार बनाया गया, लेकिन परिवार का यह दर्द हर दिल को छू रहा है। पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।

हे अल्लाह इस परिवार को सुकून दे। 

Azam khan साहब or Abdullah साहब को पैरोल न मिलना न्याय नहीं, इंसानियत के खिलाफ क्रूरता है।

राजनीति, न्याय और इंसानियत तीनों के संगम पर खड़ा एक सवाल राजनीतिक कैदी और इंसानियत का सवाल

कभी-कभी न्याय के झरने से भी पानी नहीं, लहू टपकता है। आज जब हम आज़म खान साहब और अब्दुल्ला साहब जैसे नेताओं को महीनों, बल्कि सालों तक पैरोल से वंचित देखते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं रहता — यह समाज की आत्मा का सवाल बन जाता है।

कानून कहता है — सब बराबर हैं। लेकिन वास्तविकता में कुछ आवाज़ें इतनी अनचाही बना दी जाती हैं कि उनके लिए दरवाज़े भी खुलकर सांस नहीं लेते। जब कोई व्यक्ति जेल में अपनी सजा काट रहा हो, तब भी उसे अपने परिवार, बीमारी, या अंतिम संस्कार जैसे क्षणों में इंसानियत के नाते थोड़ी राहत मिलनी चाहिए। यह एहसान नहीं, एक अधिकार होता है।

पैरोल का इनकार केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक सजा भी है। यह किसी व्यक्ति को यह महसूस करा देता है कि उसकी इंसानियत भी अब अदालत की फाइलों में दब चुकी है। और जब ऐसा व्यवहार एक राजनीतिक व्यक्ति के साथ होता है — जो जनता की आवाज़ रहा हो — तो यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या हमारी न्याय प्रणाली अभी भी निष्पक्ष है या सत्ता के इशारों पर नाचती कठपुतली बन चुकी है?

राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन इंसानियत का कोई विरोधी दल नहीं होता। जब किसी के चेहरे पर उम्र, बीमारी, और संघर्ष की लकीरें एकसाथ दिखें, तो कानून को थोड़ी सहानुभूति दिखानी चाहिए। लोकतंत्र का असली गौरव यही है — कि वह सबसे असहमत व्यक्ति के लिए भी न्याय और मानवीय सम्मान बचा सके।

अगर एक समाज अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ भी न्यायपूर्ण नहीं रह पाता, तो वह धीरे-धीरे लोकतंत्र नहीं, बदले की राजनीति में बदल जाता है। और बदला जब इंसानियत से बड़ा हो जाए, तो वह किसी के लिए भी न्याय नहीं रह जाता, सिर्फ़ क्रूरता बन जाता है।

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