AZAM KHAN क्या समाज के लिए काम करने वाले शिक्षित और योग्य लोगों के साथ यही व्यवहार होना चाहिए?

किसी भी लोकतांत्रिक समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहाँ न्याय कितना निष्पक्ष है। लेकिन आज का यथार्थ हमें यह सोचने पर मजबूर करता है AZAM KHAN क्या समाज के लिए काम करने वाले शिक्षित और योग्य लोगों के साथ यही व्यवहार होना चाहिए? कि क्या न्याय सचमुच सबके लिए समान है, या फिर उसकी आँखों पर दौलत और सत्ता की पट्टी बँधी हुई है। कई बार हम देखते हैं कि अगर कोई बलात्कारी धनवान हो सत्ता के करीब हो या सरकार के संरक्षण में हो तो जेल भी उसके लिए सज़ा नहीं बल्कि सुविधाओं का घर बन जाती है। आरामदेह बिस्तर अच्छा खाना विशेष व्यवहार जैसे अपराध कोई अपराध ही न हो। पीड़िता का दर्द उसका टूटता हुआ जीवन समाज पर पड़ा उसका असर सब कुछ व्यवस्था की फाइलों में कहीं दबकर रह जाता है।
आज़म खान साहब
इसके उलट तस्वीर तब और अधिक पीड़ा देती है जब कोई ऐसा नेता जिसने अपना जीवन समाज और देश की सेवा में लगाया हो वही जेल में अपमान और अमानवीय परिस्थितियों का शिकार होता है। एक ऐसा मुस्लिम नेता जिसने शिक्षा को बढ़ावा दिया, गरीबों की आवाज़ बना जिसका पूरा परिवार राजनीति और देश सेवा में सक्रिय रहा आज वही व्यक्ति अपने बेटे के साथ जेल में ज़मीन पर, दरी बिछाकर सोने को मजबूर है। यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि उन मूल्यों का अपमान है जिन पर हमारा संविधान टिका है। आज सवाल किसी धर्म का नहीं किसी पार्टी का नहीं सवाल इंसाफ का है। क्या समाज के लिए काम करने वाले शिक्षित और योग्य लोगों के साथ यही व्यवहार होना चाहिए? क्या सत्ता से सवाल पूछना गरीबों के हक़ में बोलना इतना बड़ा अपराध है कि इंसान की बुनियादी गरिमा भी छीन ली जाए?
यह लेख किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं बल्कि हमारे समाज की आत्मा को झकझोरने के लिए है। अगर हम चुप रहे अगर हमने अन्याय को अपनी आदत बना लिया तो कल यह अन्याय किसी भी दरवाज़े पर दस्तक दे सकता है।
समय आ गया है कि समाज सोचे समझे और सवाल करे। न्याय सुविधाओं से नहीं समानता से पहचाना जाता है। और जिस दिन यह समानता खत्म हो जाती है उस दिन लोकतंत्र सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाता है।
