Azam Khan साहब और Abdullah Azam Khan एक दूसरे का सहाराAzam Khan साहब और Abdullah Azam Khan एक दूसरे का सहारा

Azam Khan और Abdullah Azam Khan: पिता-पुत्र का अटूट रिश्ता, एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा

Azam Khan साहब और Abdullah Azam Khan साहब के बीच पिता-पुत्र के मज़बूत रिश्ते की कहानी, Azam Khan और Abdullah Azam Khan: पिता-पुत्र का अटूट रिश्ता, एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा संघर्ष और राजनीति में एक-दूसरे का सहारा। पढ़ें पूरी खबर।

Azam Khan साहब और Abdullah Azam Khan एक दूसरे का सहारा एक पिता, एक बेटा

Azam Khan और Abdullah Azam Khan: पिता-पुत्र का अटूट रिश्ता, एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा
Azam Khan और Abdullah Azam Khan: पिता-पुत्र का अटूट रिश्ता, एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा

एक दूसरे का सहारा एक पिता, एक बेटा।

चेहरे पर उम्र भर की थकान लिए आज़म ख़ान साहब हैं, और उनकी हथेली में सिमटे हुए अब्दुल्ला आज़म जैसे पूरी दुनिया से बचाने के लिए बस यही गोद काफ़ी हो।
तस्वीर में मुस्कान है, लेकिन इस मुस्कान के पीछे उन जेलों की सलाख़ों की परछाइयाँ हैं जहाँ कभी सितापुर, कभी हारदोई और अब रामपुर की कैद ने इस रिश्‍ते को बार‑बार आज़माया।

पाँच साल की सज़ा काटकर मुश्किल से पचास दिन की साँस मिली थी

कि फिर सात साल की एक और सज़ा का फ़रमान आ गया।
क़ानून अपनी जगह है, अदालतें अपने उसूलों पर क़ायम हैं, मगर एक बूढ़े बाप की कमर पर जो बोझ है, उसका कोई धारा‑उपधारा हिसाब नहीं रख सकती।
कभी बाप सितापुर जेल में थे और बेटे हारदोई में जेल में कभी दोनों साथ थे लेकिन घर का दरवाज़ा हर बार अधूरा ही खुला, हर बार आधा परिवार ग़ायब रहा।

इस तस्वीर में जो सुकून नज़र आता है,

पिता-पुत्र का अटूट रिश्ता वही आज उनके परिवार की सबसे बड़ी तड़प है।माँ की आँखें हर अज़ान पर दरवाज़े की ओर उठती होंगी, बह भाई हर दस्तक पर चौंकता होगा कि शायद अब्बा या भाई आ गए हों।
रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त ओर वफादार लोग पार्टी के साथी सबके बीच एक सन्नाटा है कोई खुलकर रो भी नहीं पा रहा, कोई खुलकर बोल भी नहीं पा रहा।

समाज की राजनीति भी अजीब है

विरोध की राजनीति कब बदले की सियासत बन जाती है, पता ही नहीं चलता फ़ैसला अदालत का होता है, पर जश्न और मातम सड़कों पर मनाए जाते हैं।
भीड़ के नारे तय करते हैं कि कौन देशभक्त है, कौन गद्दार; और अक्सर फ़ैसला इस बात पर नहीं, कि जुर्म क्या है, बल्कि इस पर होता है कि नाम क्या है, मज़हब क्या है।

मुसलमान होना आज के दौर में मुश्किल है

कभी शक की नज़र, कभी नफ़रत की ज़ुबान, कभी बेयक़ीनी की दीवार।
कोर्ट के काग़ज़ों पर भले सिर्फ़ धाराएँ लिखी हों, मगर दिलों में ये यक़ीन बैठ गया है कि बहुत बार सज़ा चेहरों को देख कर भी लिखी जाती है।
फिर भी उम्मीद की एक लकीर बाक़ी रहती है कि शायद किसी सुबह ये सलाख़ें भी टूट जाएँ, शायद कोई सिर्फ़ फ़ाइल नहीं, इंसानी चेहरों के आँसू भी पढ़ ले।

आज इस तस्वीर को देखकर ये दुआ अपने आप ज़बान पर आ जाती है

या अल्लाह, हर क़ैदी बाप को उसके बच्चों उसकी बीवी उसके अपनो से मिला दे, हर बेटे को उसके बूढ़े वालिद की छाया नसीब कर दे।
जो सज़ा मिलनी हो, इंसाफ़ के साथ मिले, मगर किसी मज़हब, किसी बिरादरी, किसी सियासी दुश्मनी की वजह से न मिले क़ानून हो, लेकिन इंसानियत के साथ हो।

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