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Abdullah Azam Khan ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है |

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हमारी कुछ गलतियों की सज़ा भी साथ चलती है

हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है

 

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती

मां बेटे की जुदाई का दर्द अमिट है,

खासकर जब बेटा जेल की चहारदीवारी में कैद हो। अब्दुल्लाह आज़म खान रामपुर जेल में बंद हैं, जहां सात साल की सज़ा ने एक मां डॉ तज़ीन फातिमा जी के सीने पर पहाड़-सा ढा दिया है।

मां का टूटा मन

ताज़ीन फातिमा जी जो खुद राजनीतिक संघर्षों से जूझ चुकी हैं, अब बेटे ओर शौहर माननीय आज़म खान साहब की कैद में रातें काट रही होंगी। जेल पहुंचकर घंटों इंतज़ार, फिर मुलाकात से इनकार का दर्द—यह कैसी यातना है? हर सांस में बेटे ओर शौहर की याद, आंसुओं में परिवार की टूटी उम्मीदें, और दिल में बस एक प्रार्थना बेटा सुरक्षित रहे आज़म साहब की सेहत अच्छी रहे                                                                       मां का वह गले लगाने का अधूरा सपना कब पूरा होगा?

बेटे ओर शौहर की जेल
जेल की ठंडी दीवारें, रात तीन बजे अलगाव का भय, और पिता आज़म खान के साथ कैद—अब्दुल्लाह आज़म खान पर क्या गुज़र रही होगी।नौजवान उम्र में सात साल की सज़ा, फ़र्ज़ी पासपोर्ट और पैन कार्ड के केसों में दोषी ठहराया जाना, ऊपर से परिवार से दूरी। जेल की अंधेरी कोठरी में मां की ममता की धूप कब महसूस होती होगी?

भावुक अपील
यह जुदाई सिर्फ एक परिवार की नहीं, इंसानियत की कहानी है। मां का आंसुओं से भीगा चेहरा और बेटे का उदास चेहरा—काश न्याय की किरण दोनों तक पहुंचे। ज़िन्दगी रही तो मिलेंगे, वरना ऊपर—यह पिता का पुराना कथन आज मां-बेटे पर चरितार्थ हो रहा दुआ करें, यह दर्द शीघ्र समाप्त हो।

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