आज़म खान की दर्द भरी दास्तान: तालीम, सियासत और सब्र की कहानी
उत्तर प्रदेश के आज़म खान का नाम सियासत से ज्यादा तालीम के मिशन से जुड़ा रहा है। रामपुर में स्थापित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी सिर्फ एक इदारा नहीं बल्कि एक ख्वाब था — ऐसा ख्वाब जिसमें हर गरीब बच्चा पढ़ सके। आज उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म खान के साथ जुड़ी मुश्किलात इस मिशन को और भावुक बना देती हैं।

- इल्म की अहमियत
- मुस्लिम एजुकेशन इंडिया
- सामाजिक एकता
- मोहब्बत बनाम नफरत
- राजनीतिक मुकदमे
तालीम की रोशनी और आज़म खान की संघर्ष गाथा
सियासत से बड़ा मिशन: तालीम जेल के पीछे की इंसानी कहानी क्यों शिक्षा समाज को टूटने से बचाती है
मोहब्बत बनाम नफरत असली लड़ाई जौहर यूनिवर्सिटी का सपना शिक्षा मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। यह केवल पढ़ना-लिखना सिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि सही-गलत में फर्क समझने की समझ देती है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को पहचानता है, इसलिए वह समाज और देश के विकास में बेहतर योगदान दे पाता है।
त्तर प्रदेश के आज़म खान ने रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी जैसी शैक्षणिक संस्था बनाकर शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की। उनका उद्देश्य था कि गरीब और पिछड़े तबके के बच्चों को भी पढ़ने का अवसर मिले।
लेकिन आज वही प्रयास विवादों और कानूनी मामलों से जुड़कर उनके लिए मुश्किलों का कारण बन गया, और उन्हें जेल तक जाना पड़ा। समर्थक इसे तालीम के मिशन की कीमत मानते हैं, जबकि विरोधी इसे कानून की कार्रवाई बताते हैं।
यह घटना याद दिलाती है कि समाज में बड़े काम अक्सर बड़े संघर्ष भी साथ लेकर आते हैं।
मोहब्बत की राह आज़म खान साहब ओर उनकी दर्द भरी दास्तान🥺
“पहले तालीम से तुम मोड़ दिए जाओगे,
फिर किसी जुर्म से तुम जोड़ दिए जाओगे
हाथ से हाथ की ज़ंजीर बनाकर निकलो
वर्ना धागे की तरह तुम तोड़ दिए जाओगे।”
ये अशआर सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि वक़्त की सच्ची पुकार हैं। ये हमें आगाह करते हैं कि अगर हमने तालीम को अपना सहारा न बनाया तो हालात हमें अपनी मर्ज़ी से मोड़ देंगे। लेकिन अगर हम इल्म को सीने से लगा लें तो वही तालीम हमें टूटने से बचा लेगी बिखरने से रोक लेगी और एक मज़बूत ज़ंजीर की तरह हमें आपस में जोड़ देगी।
तालीम महज़ किताबों का ज्ञान नहीं होती यह ज़हन की रौशनी है दिल की नरमी है और सोच की बुलंदी है। तालीम इंसान को इंसान बनाती है। वह सिखाती है कि नफ़रत की राह आसान ज़रूर लगती है मगर मोहब्बत का रास्ता ही असली कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाता है।
आज जब समाज कई तरह की सियासी और सामाजिक उलझनों से गुज़र रहा है ऐसे में तालीम की अहमियत और बढ़ जाती है।
सियासत की गर्म हवाओं और इम्तिहानों के दरमियान भी उन्होंने तालीम को अपनी पहचान बनाया
आज़म ख़ान साहब का ज़िक्र इसी सिलसिले में आता है। सियासत की गर्म हवाओं और इम्तिहानों के दरमियान भी उन्होंने तालीम को अपनी पहचान बनाया। आज जब वह जेल की सलाखों के पीछे हैं तो यह सिर्फ एक शख़्स की कहानी नहीं बल्कि एक पूरे ख़ानदान के सब्र और कुर्बानी की दास्तान है। उनके घरवालों ने मुश्किलात के लंबे सफ़र को सहा मगर तालीम के मिशन से कदम पीछे नहीं खींचे।
उन्होंने ऐसे इदारों की बुनियाद रखी जहाँ इल्म हर तबके तक पहुँचे। उनका ख्वाब था कि गाँव कस्बे और शहर हर कोने में तालीम की रौशनी फैले। उन्होंने चाहा कि गरीब का बच्चा भी बड़े सपने देख सके और उन सपनों को हकीकत में बदल सके।
आज हालात चाहे जैसे भी हों मगर तालीम के लिए दी गई कुर्बानियाँ मिटाई नहीं जा सकतीं। वक्त की गर्द उन कोशिशों को धुंधला ज़रूर कर सकती है मगर मिटा नहीं सकती। क्योंकि इल्म की नींव पर खड़ी इमारतें सदियों तक खड़ी रहती हैं।
मोहब्बत ही वह रूह है जो हर इंक़लाब को इंसानियत का पैग़ाम बनाती है।
समाज तब बिखरता है जब लोग नफरत सीखते हैं, और जुड़ता है जब लोग पढ़ते हैं। तालीम सिर्फ नौकरी नहीं देती — वह इंसान बनाती है, सोच बदलती है और मोहब्बत पैदा करती है। इतिहास गवाह है कि इल्म की बुनियाद पर खड़ी कौमें कभी मिटती नहीं।
हमें समझना होगा कि अगर हम हाथों में हाथ डालकर नहीं चलेंगे, तो हालात हमें धागे की तरह तोड़ देंगे। मगर अगर हम मोहब्बत और तालीम की ज़ंजीर बन जाएँ तो कोई ताकत हमें बिखेर नहीं सकती।
तालीम ही असली ताकत है।
तालीम ही असली इंक़लाब है।
और मोहब्बत ही वह रूह है जो हर इंक़लाब को इंसानियत का पैग़ाम बनाती है।
आइए हम इल्म को अपना हथियार नहीं अपना चराग़ बनाएँ।
नफ़रत को जवाब मोहब्बत से दें।
और हर घर हर गली हर शहर में तालीम की रौशनी फैला दें।
क्योंकि जब समाज पढ़ता है
तो समाज बढ़ता है।
