जेल में बंद निर्दोष क्या भारत में कानून सबके लिए बराबर है? जेल, इंसाफ और एक नौजवान की आवाज़
जेल में बंद निर्दोष एक बेटा, एक नौजवान, एक हिन्दुस्तानी
लेकिन कभी-कभी इंसान की पहचान उससे पहले तय कर दी जाती है।
हमने उस देश का सपना देखा था जहाँ किताबों में लिखा था
कानून सबके लिए बराबर है।मगर जब इंसान सलाखों के पीछे बैठकर अपने ही देश से सवाल पूछने लगे, तब समझ आता है कि किताब और हक़ीक़त के बीच दूरी कितनी है।जब अभिनेता नसीरुद्दीन शाह कहते हैं कि देश बदल गया है, तो यह सिर्फ एक कलाकार की राय नहीं होती — यह करोड़ों भारतीयों की बेचैनी बन जाती है।

जेल में बंद निर्दोष सियासत, मुकदमे और इंसान का बदलता वजूद
मोहम्मद आज़म खान बरसों तक राजनीति में रहे।
उन्होंने शिक्षा, गरीबों और समाज के कमजोर वर्गों की बात की।
लेकिन अदालतों की तारीख़ें, लगातार केस और लंबी कानूनी प्रक्रिया इंसान को धीरे-धीरे एक ज़िंदा व्यक्ति से ज्यादा एक फाइल बना देती है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है —
क्या कानून की रफ्तार हर नाम के लिए एक जैसी होती है?
सज़ा पहले, फैसला बाद में – न्याय व्यवस्था पर सवाल
भारत में कई लोग सालों तक बिना अंतिम फैसले के जेल में रहते हैं।
मुकदमे चलते रहते हैं, मगर ज़िंदगी ठहर जाती है।
पढ़ाई रुक जाती है
परिवार टूट जाता है
समाज पहचान बदल देता है
कई बार सज़ा अदालत से पहले समाज दे देता है।
जेल में बंद निर्दोष
जेल सिर्फ शरीर को कैद नहीं करती —
वो सपनों, इज़्ज़त और रिश्तों को भी कैद कर देती है।
पहचान बनाम इंसाफ
सबसे बड़ा दर्द तब होता है जब लगे
इल्ज़ाम से पहले नाम देखा गया
नाम से पहले मज़हब देखा गया
और फैसला पहले ही तय हो गया
भीड़ फैसला कर देती है
अदालत बाद में सोचती है
नफ़रत नहीं, बराबरी की लड़ाई
क्या नफ़रत का जवाब नफ़रत है?
नहीं। अगर हम भी वही बन जाएँ जिससे शिकायत है,
तो फर्क खत्म हो जाएगा।
यह लड़ाई किसी धर्म या समाज के खिलाफ नहीं
यह लड़ाई नफ़रत के खिलाफ है
यह आवाज़ बदले की नहीं
बराबरी की है
हम कैसा भारत चाहते हैं?
एक ऐसा हिन्दुस्तान जहाँ
नाम देखकर शक न हो
मज़हब देखकर सज़ा न हो
सवाल पूछना जुर्म न हो
जेल में बंद निर्दोष
अगर इंसाफ में देर है
तो उसे बेहतर बनाना होगा
आवाज़ दबाकर नहीं
उम्मीद अभी ज़िंदा है
इंसाफ देर से आए
मगर आए ज़रूर
क्योंकि उम्मीद ही किसी देश की असली ताकत होती है
और भरोसा ही लोकतंत्र की बुनियाद।
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