Azam Khan साहब ओर Abdullah का यह दौर भी एक इम्तिहान का हिस्सा है। दिसंबर की सर्दी और जेल की ठंडक
दिसंबर की सर्दी कब से उत्तर प्रदेश की सरज़मीं पर उतर आई है। गलियों में सन्नाटा है घरों में लोग गरम रज़ाइयों में लिपटे हुए चैन की नींद सो रहे हैं।Azam Khan साहब ओर Abdullah का यह दौर भी एक इम्तिहान का हिस्सा है। दिसंबर की सर्दी और जेल की ठंडक पर वही सर्दी जब लोहे की सलाखों के पीछे पहुँचती है तो हर झोंका किसी तीर की तरह चुभता है। बाहर आग की लपटें सुकून देती हैं, मगर जेल की दीवारों में सिर्फ़ ठंडी हवा और खामोशी गूंजती है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
इस ठंड में जब लोग अपने परिवारों के साथ गर्म चाय की प्याली में मोहब्बत के स्वाद खोज रहे हैं,
उसी वक्त आज़म ख़ान साहब और अब्दुल्ला आज़म ख़ान उस जेल की कठोर दुनिया में हैं जहां न गरम रजाई है न चैन की नींद न अपने अपनों का साया। आज़म ख़ान साहब वो नाम जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी कौम, तालीम और इंसाफ़ के लिए समर्पित कर दी। जिन्होंने लाखों छात्रों के लिए दरवाज़े खोले, तालीम को रोशनी बनाया, और हर गरीब की आवाज़ को बुलंद किया। वही इंसान आज सलाखों के पीछे है
न जाने यह कैसी दुनिया है, जहां समाज का रहनुमा सच्चाई का बोझ लेकर जेल की कोठरी में कैद है।
यह सर्दी सिर्फ़ मौसम की नहीं है, यह सर्दी तो इंसाफ़ की रूह में उतर आई है। जब किसी का कर्म उसके अंजाम से मेल न खाए, तो हवाएं भी ठंडी नहीं, बल्कि बोझिल लगती हैं।
इतिहास गवाह है जो लोग समाज के लिए जीते हैं, वे अक्सर सबसे कठिन इम्तहानों से गुजरते हैं। आज़म ख़ान साहब का यह दौर भी शायद उसी इम्तिहान का हिस्सा है। मगर एक दिन जब यह सर्दी पिघलेगी, जब न्याय की धूप फिर चमकेगी, तब लोग याद करेंगे कि किस सख्त सर्द हवाओं में एक नेता ने अपने ईमान और उसूलों को ज़िंदा रखा।

