एक दोस्त का बिछड़ना और आज़म ख़ान साहब के साथ वक़्त की बेरुख़ी ।एक दोस्त का बिछड़ना और आज़म ख़ान साहब के साथ वक़्त की बेरुख़ी ।

Mulayam Singh Yadav जी का बिछड़ना ओर Azam Khan साहब पर वक्त की बेरुखी

मुलायम सिंह यादव और आज़म ख़ान की दोस्ती Mulayam Singh Yadav जी का बिछड़ना ओर Azam Khan साहब पर वक्त की बेरुखी भारतीय राजनीति में एक मिसाल मानी जाती थी। एक दौर था जब दोनों साथ खड़े होकर सियासत की दिशा तय करते थे, लेकिन आज हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। मुलायम सिंह यादव के बिछड़ने के बाद आज़म ख़ान अकेले संघर्ष कर रहे हैं, और वक्त की बेरुख़ी उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है।

एक दोस्त का बिछड़ना और आज़म ख़ान साहब के साथ वक़्त की बेरुख़ी ।
एक दोस्त का बिछड़ना और आज़म ख़ान साहब के साथ वक़्त की बेरुख़ी ।

राजनीति के इस कठोर मैदान में बहुत सी दोस्तियाँ केवल औपचारिक होती हैं मुस्कुराहटों तक सीमित और सत्ता तक सीमित। मगर आज़म खान साहब और मुलायम सिंह यादव जी की दोस्ती उन चुनिंदा रिश्तों में से थी जो विचारों, जज़्बातों और सच्चाई के साथ बुनी गई थी। दोनों ने संघर्ष के दिनों में एक-दूसरे का साथ दिया, एक-दूसरे का दर्द समझा और ज़मीन के लोगों के लिए politics को एक मिशन बनाया सिर्फ़ कुर्सी नहीं, क़ौम की आवाज़ बनने का मिशन।

आज़म खान साहब ने जेल की सलाखों के पीछे से लेकर बेबसी के लम्हों तक उन्होंने कभी आँसू नहीं बहाए।

उन्होंने अन्याय सहा, ताने सुने, अपमान झेला… मगर जब मुलायम सिंह यादव जी का देहांत हुआ, तब शायद पहली बार उनका वह दिल दर्द से पिघल गया। शायद इसलिए क्योंकि वे जानते थे अब वह साथी नहीं रहा जो उनके दर्द को बिना कहे समझ जाता था।

आज जब आज़म खान साहब और उनके बेटे जेल में बंद हैं, जब उन पर इलज़ामों के साये हैं, तब सत्ता की गलियों में सन्नाटा है। मुलायम सिंह यादव जी अगर आज होते, तो शायद इतिहास कुछ और कहता। शायद वे अपने उस पुराने साथी के साथ वैसे ही खड़े होते जैसे संघर्ष के दिनों में खड़े हुए थे।

वे जानते थे कि राजनीति में विरोध होना एक बात है, मगर ज़ुल्म के सामने चुप रह जाना दूसरी।
मुलायम सिंह का वजूद राजनीति के लिए सिर्फ़ एक नाम नहीं था वे भरोसे, संघर्ष और इंसाफ़ के प्रतीक थे। और आज, जब इंसाफ़ की पुकार दबाई जा रही है, तब मुलायम सिंह जैसे नेता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा महसूस होती है।

आजम खान साहब के अकेलेपन में जो दर्द है, वह सिर्फ़ एक साथी का न होना नहीं वह वक़्त की बेरुख़ी का सबूत है। ज़ुल्म अगर जारी है, तो सवाल यह है क्या आज़म खान साहब आज भी वही मज़बूत आवाज़ बने रह पाएँगे, या उनकी खामोशी इतिहास में एक और हाशिये पर धकेली गई सच्चाई बन जाएगी

Mulayam Singh Yadav जी का बिछड़ना ओर Azam Khan साहब पर वक्त की बेरुखी
Mulayam Singh Yadav जी का बिछड़ना ओर Azam Khan साहब पर वक्त की बेरुखी

बहुत खुशनसीब थे हम लोग जो आज के ज़माने में हमने जनाब आज़म खान साहब को देखा

वरना ज़माने निकल जाएंगे ऐसा शख्स सदियों में इस जमीन पर भेजा जाता है ।।

अल्लाह आपकी परेशानियों को खत्म करे 

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