क्यों आज भी Azam Khan गरीब तबके की सबसे बड़ी उम्मीद माने जाते हैं?
आज़म ख़ान साहब केवल एक नेता नहीं बल्कि ग़रीबों, मज़लूमों और दबे-कुचले तबके की आवाज़ हैं। क्यों आज भी Azam Khan गरीब तबके की सबसे बड़ी उम्मीद माने जाते हैं? उनकी सियासत भूख, बेबसी और इंसाफ़ की लड़ाई की कहानी है।आज़म ख़ान साहब सिर्फ़ एक सियासी नाम नहीं हैं, बल्कि उन गली-कूचों की आवाज़ और उम्मीद हैं जहाँ भूख, बेबसी और लाचारी रोज़ सियासत से हार मानकर सो जाती है। उन्होंने हमेशा समाज के कमज़ोर, ग़रीब और हाशिये पर खड़े लोगों के हक़ के लिए संघर्ष किया है। उनका जीवन संघर्ष, इंसाफ़ और जनसेवा की मिसाल है।

यह तस्वीरें एक ऐसे नेता की गवाही देती हैं
जो काले शीशों वाली गाड़ी के भीतर बैठा है, लेकिन दिल से सड़क पर बैठे उस आम आदमी के साथ है जिसका सहारा सिर्फ उसका जज़्बा और टूटी‑फूटी साइकिल है।
आज जब सियासत अक्सर रोशनी, मंच और कैमरों के पीछे छिप जाती है, तब भी आज़म ख़ान साहब जैसे लोग हैं जो भीड़ में खोए हुए उस गुमनाम चेहरे की आंखों में अपना चेहरा ढूंढ लेते हैं।
आज़म ख़ान साहब सिर्फ एक सियासी नाम नहीं,
बल्कि उन गली‑कूचों की उम्मीद हैं जहाँ भूख और बेबसी रोज़ सियासत से हार मानकर सो जाती है।
किसी की फटी हुई जेब देखकर जिनके दिल में दर्द उठे, वही तो असली नेता होता है वही जो व्हीलचेयर पर बैठे मज़दूर का हाथ पकड़कर उसे सिर्फ वोटर नहीं इंसान समझे, भाई समझे, अपना समझे।
इन तस्वीरों में उनकी गाड़ी पर सजी फूलों की मालाएँ शायद सत्ता का प्रतीक हैं
लेकिन खिड़की से झुककर निकला हुआ उनका हाथ जनता से रिश्ते की डोर है।
यह वही हाथ है जो कभी किसी मज़दूर के कंधे पर रखकर उसे हिम्मत देता था, कभी किसी बूढ़ी अम्मा के आंसू पोछने के लिए आगे बढ़ जाता था और कभी बच्चों के सिर पर हाथ रखकर उनके बेहतर भविष्य की दुआ बन जाता है।
गरीबों का नेता होना सिर्फ नारों का खेल नहीं यह तो रोज़ अपने आराम, अपनी नींद, अपने डर और अपनी मज़बूरियाँ कुर्बान करने का नाम है।
जब रात गहरा जाती है और शहर की सड़कों पर सिर्फ खामोशी और भूख का साया रह जाता है, तब भी
आज़म ख़ान साहब जैसे लोग अपने लोगों के बीच खड़े दिखाई देते रहेंगे
कभी किसी के इलाज के लिए दौड़ते, कभी किसी के घर का उजड़ा चूल्हा जलाने की कोशिश करते।
पर अफसोस ऐसे लोग आज बहुत कम है ओर जो है उन्हें जेल की सलाखों के पीछे कैद कर दिया है ।


आज जब राजनीति में चेहरे बदलते रहते हैं
वादे बदल जाते हैं, सिर्फ कुर्सियाँ स्थायी हो जाती हैं, ऐसे दौर में आज़म ख़ान साहब जैसे नेता हमें याद दिलाते रहे हैं कि सियासत दरअसल सेवा का दूसरा नाम है।
गरीब की झुकी हुई नज़र को भरोसा देना, मज़लूम की काँपती हुई आवाज़ को ताकत देना और हाशिए पर खड़े इंसान को अपने पास खींचकर कहना तुम अकेले नहीं हो यही उनका असली क़द है, यही उनकी असली सियासत है, और यही वजह है कि लोग उन्हें दिल से अपना नेता कहते हैं। ओर कहते हैं
मेरा नेता मेरा अभिमान है l

