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रामपुर जेल Azam Khan साहब और Abdullah Khan को नहीं मिल रहीं मूल सुविधाएँ

उत्तर प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ नेता आज़म खान साहब और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म खान साहब इस समय रामपुर ज़िला जेल में बंद हैं। रामपुर जेल: बी-कैटेगरी में Azam Khan साहब और Abdullah Azam Khan को नहीं मिल रहीं मूल सुविधाएँ  जेल प्रशासन द्वारा उन्हें बी-कैटेगरी में रखा गया है, जिसके चलते उन्हें सामान्य जेल सुविधाओं और मुलाकात की प्रक्रिया में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस व्यवस्था ने उनकी रोज़मर्रा की सुविधाओं को सीमित कर दिया है।

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रामपुर जेल में Azam Khan और Abdullah Azam Khan
रामपुर जेल में Azam Khan और Abdullah Azam Khan

Azam Khan ,Abdullah Azam Khan रामपुर जेल में बंद हैं, जहाँ उनसे मिलना मुश्किल हो गया है। बी केटेगिरी की जेल में सामान्य सुविधाओं से वंचित हैं।

आज़म खान साहब और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म खान साहब रामपुर जेल में बंद हैं, जहाँ उनसे मिलना मुश्किल हो गया है। वे एक राजनीतिक कैदी हैं, लेकिन बी केटेगिरी की जेल में सामान्य सुविधाओं से वंचित हैं।

जेल की क्रूर सच्चाई

ठंडी रातों में कंबल न मिलना, ज़रूरी दवाओं की कमी और कैदी वाहन में चढ़ने से इनकार—ये उनकी रोज़ की जंग है।
पिता-पुत्र की आँखें तरस रही हैं, अपने लोगों से मिलने के लिए जेल की ऊँची दीवारें उनके बीच की दूरी बढ़ा रही हैं।
क्या ये न्याय है या सत्ता का बदला, जो एक बुज़ुर्ग नेता को ऐसी यातनाएँ दे रहा है?

Azam Khan अपनों से दूर, संघर्ष की आग

कल्पना कीजिए उस पिता का दर्द, उस बेटे का दर्द जो एक दूसरे की साँसों की चिंता में जागता है, ओर अपनो से मुलाकात का दरवाज़ा भी बंद है।
रामपुर जेल की बैरक में सर्द हवाएँ उनकी हड्डियाँ चीर रही हैं, फिर भी वे बोलेरो की माँग पर अड़े रहे।
ये केवल एक कैदी की कहानी नहीं, लोकतंत्र की लाचारी की फरियाद है।

न्याय की उम्मीद

सात साल की सज़ा PAN कार्ड फॉर्जरी में मिली, लेकिन कई मुकदमों में बरी भी हुए। अब ज़मानत की प्रक्रिया चल रही है, पर जेल की बेड़ियाँ टूटने का इंतज़ार लंबा हो रहा। आज़म खान साहब की आवाज़ दबाई न जा सकेगी, उनकी लड़ाई जारी रहेगी।

उम्मीदों से भरी आँख़ें

आज़म खान साहब की बहन और बीवी डॉ तज़ीन फातिमा जी सुबह‑सुबह उम्मीदों से भरी आँखों के साथ जेल के फाटक पर पहुँची थीं।

Azam Khan रामपुर जेल: बी-कैटेगरी में मिल रहीं मूल सुविधाएँ
Azam Khan रामपुर जेल: बी-कैटेगरी में मिल रहीं मूल सुविधाएँ

दिल में बस एक ही अरमान था अपने बेटे अब्दुल्लाह ओर अपने शौहर को पल भर के लिए ही सही, लेकिन अपनी बाहों में भर लें, उनकी आँखों में झाँक कर तसल्ली कर लें कि वह ठीक है।
लेकिन जब भारी‑भरकम लोहे के उन्हीं फाटकों से वे वापस बाहर निकलीं, तो चेहरों पर सिर्फ़ मायूसी थी, होठों पर काँपती हुई एक ही बात मुलाक़ात नहीं हुई उस क्षण जैसे उनके भीतर की सारी ताक़त टूट गई हो जिस रास्ते से वे उम्मीद लेकर गई थीं, वहीं से खाली हाथ भरे दिल और नम आँखों के साथ लौटना पड़ा।

जेल के नियम

काग़ज़ी प्रक्रियाएँ और सख़्त पहरे, एक माँ के आँसुओं से ज़्यादा भारी पड़ गए। न मुलायम चेहरे की मासूमी देख पाए, न बेटे की आवाज़ सुन पाए, बस दूर से दीवारों को देखते रहे, जैसे वे खुद उनसे कह रही हों कि आज भी तुम्हारे और तुम्हारे बच्चे के बीच यही दीवार खड़ी रहेगी।
बहन के दिल में भी तूफ़ान मचा था भाई के बेटे को अपना बेटा समझ कर आई थीं, सोचा था कि कुछ हौसला बँधाएंगी,भाई को पल भर के लिए देख सकूंगी लेकिन लौटते वक़्त उनके कदम भी लड़खड़ा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा शहर उनके साथ खड़ा होकर भी, उनकी इस चुप पीड़ा को सुन नहीं पा रहा हो।

अदालतों की तारीख़ें our Azam Khan Sahab Ka Dard

यही सबसे बड़ा दुख है अदालतों की तारीख़ें बदल जाती हैं,पहरेदार बदल जाते हैं, पर एक माँ की गोद खाली ही रह जाती है, एक बहन की दुआ अधूरी ही रह जाती है। मुलाक़ात न हो पाना सिर्फ़ नियमों की बात नहीं, किसी घर की रौशनी को थोड़ा और मंद कर देने जैसा है, जैसे किसी ने उम्मीद की आख़िरी लो को भी अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लिया हो। 

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