azam khanazam khan

आज़म ख़ान साहब एक नाम जो कभी जज़्बातों, संघर्षों और अल्फ़ाज़ की गर्मी से जाना जाता था, आज जेल की दीवारों के पीछे समय का बोझ ढो रहा हैं।

हम खून की किश्ते तो कई दे चुके लेकिन !
ए खाक-ए-वतन क़र्ज़ अदा क्यों नही होता !

Azam khan का संघर्ष
Azam khan का संघर्ष
azam khan
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आज़म खान साहब एक ऐसे सच्चे नेता हैं जिनकी पहचान उनकी सादगी, संघर्ष और जनता से जुड़ाव में बसती है।आज़म ख़ान साहब एक नाम जो कभी जज़्बातों, संघर्षों और अल्फ़ाज़ की गर्मी से जाना जाता था, आज जेल की दीवारों के पीछे समय का बोझ ढो रहा हैं।
उन्होंने हमेशा बेआवाज़ों की आवाज़ बनकर समाज के निचले तबके के हक़ की लड़ाई लड़ी।
राजनीति से परे, उनका जीवन समर्पण, सोच और संवेदनशीलता की मिसाल है।

हर कठिन दौर में भी उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। उनकी ईमानदारी, विद्वता और जज़्बे ने लाखों दिलों में जगह बनाई है। आज भी लोग उन्हें प्यार, सम्मान और दुआओं से याद करते हैं।

 

 

एक ओर गीता जैसी हिंदू परंपरा की किताब है, दूसरी ओर कुरआन शरीफ

जैसी इस्लामी परंपरा की किताब और दोनों को सम्मान के साथ हाथों में थामे माननीय मोहम्मद आज़म ख़ान साहब यही दृश्य बताता है कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इरादे अगर मिलकर चलने के हों तो कोई भी दीवार बड़ी नहीं रहती। नफरत बहुत समय नहीं रहती एक दिन वो लोग भी समझेंगे जो नफरत में अंधे हो चुके हैं ।

जब गीता के शब्द और कुरआन की आयतें एक ही मेज़ पर सजती हैं, तो नफ़रत के सारे तर्क अपने आप हार जाते हैं।
इंसानियत का मज़हब सबसे ऊँचा है।
जो हाथ कलम उठाकर नफरत लिख सकते थे,उन हाथों ने हमेशा इंसाफ की बात की थी हिन्दू मुस्लिम एकता की बात की थी गरीबी के हक की बात की भाईचारे ओर मोहब्बत की इबादत लिखी ।

वहीं शख्स आज गुनाहगार हो गए उन्हीं को जेल में डाल दिया गया

तनहा अकेला इस कड़कड़ाती ठंड में अफसोस ये है कि सच को देख कर भी लोग खामोश ही रहे ।

Azam Khan
  Azam Khan

क्या राजनीति इतनी कठोर होनी चाहिए कि इंसानियत की ताप भी उसमें ठंडी पड़ जाए? जो व्यक्ति दशकों तक लोगों की आवाज़ बना रहा, जिनकी ज़ुबान में अब भी कौम की पुकार गूंजती है उन्हें इस सर्दी में इतनी सख़्ती मिलना कैसी इंसाफ़ की निशानी है?
सर्दियों की यह कठोर रातें केवल मौसम की ठंड नहीं लातीं बल्कि समय की बेरहमियों का भी अहसास कराती हैं। जब रूह तक सिहर उठे और उम्र अपनी तपिश खोने लगे, तब इंसान को सज़ा नहीं, सुकून चाहिए, इंसाफ़ चाहिए।

आज़म ख़ान साहब एक नाम जो कभी जज़्बातों, संघर्षों और अल्फ़ाज़ की गर्मी से जाना जाता था, आज जेल की दीवारों के पीछे समय का बोझ ढो रहा हैं। उनकी उम्र अब दावात की तरह है स्याही सूख रही है पर उस कलम में अभी भी सच्चाई की महक बाकी है। कहते हैं, एक सच्चा नेता सिर्फ कुर्सी से नहीं, अपने लोगों के दिलों से पहचाना जाता है। और आज भी रामपुर ओर भारत की हवाओं में उनका नाम सम्मान की तरह गूंजता है।

दुआ है कि यह सर्द हवाएँ उनके लिए रहमत बनें, और आने वाले दिन उन्हें इंसाफ़, राहत और इज़्ज़त की नई सुबह दें। आमीन ।

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